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‘मेरी उम्र 36 वर्ष है…’ यही थे आरक्षक सूर्या के अंतिम शब्द, अचानक बिछड़ गया चौरई का हंसमुख चेहरा

16 वर्षों तक पुलिस विभाग में दी सेवा, चांद थाने में बनाई थी ‘सुपर कॉप’ की पहचान; निधन की खबर से चौरई और चांद क्षेत्र में पसरा मातम

चौरई : कुछ लोग अपनी ड्यूटी निभाकर चले जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो अपने व्यवहार, मुस्कान और आत्मीयता से लोगों के दिलों में ऐसी जगह बना लेते हैं कि उनके जाने के बाद भी उनकी मौजूदगी का एहसास बना रहता है। चौरई थाने में पदस्थ आरक्षक सूर्योदय बघेल, जिन्हें हर कोई प्यार से ‘सूर्या’ कहकर पुकारता था, उन्हीं व्यक्तित्वों में से एक थे। शनिवार सुबह उनके निधन की खबर सामने आई तो पुलिस विभाग के साथ चौरई और चांद क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। जो लोग उन्हें रोज हंसते-मुस्कुराते देखते थे, उनके लिए यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि सबके बीच अपनी सहज मुस्कान बिखेरने वाला सूर्या अब उनके बीच नहीं रहा।

और पीछे रह गए उनके वे शब्द, जो अब हमेशा के लिए स्मृतियों में दर्ज हो गए— ‘मेरी उम्र 36 वर्ष है…’

एक उम्र नहीं, एक पूरी दुनिया छोड़ गए सूर्या

सिवनी के भैरवगंज निवासी आरक्षक सूर्योदय बघेल ने पुलिस विभाग में लगभग 16 वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं। अपने सेवाकाल में उन्होंने न केवल अपनी जिम्मेदारियां निभाईं, बल्कि अपने व्यवहार से लोगों के बीच एक अलग पहचान भी बनाई। हंसमुख स्वभाव, मिलनसार व्यक्तित्व और हर किसी से आत्मीयता के साथ मिलने का उनका अंदाज उन्हें दूसरों से अलग बनाता था।

सूर्या उन लोगों में से थे, जिनसे मिलने के लिए किसी औपचारिकता की जरूरत नहीं पड़ती थी। उनका सहज व्यवहार और चेहरे पर रहने वाली मुस्कान लोगों को उनसे जोड़ देती थी। पुलिस की वर्दी में अपनी जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ उन्होंने आम लोगों के बीच भी अपने व्यवहार से सम्मान और विश्वास अर्जित किया था।

चांद थाने में बनाई ‘सुपर कॉप’ की पहचान

आरक्षक सूर्योदय बघेल ने चांद थाने में लगभग पांच वर्षों तक पदस्थ रहकर सेवाएं दीं। इस दौरान क्षेत्र में उनकी पहचान एक सक्रिय और मिलनसार पुलिसकर्मी के रूप में बनी। क्षेत्र के लोगों से उनका परिचय और आत्मीय संबंध था। यही वजह थी कि चांद क्षेत्र में भी उनके चाहने वालों की कमी नहीं थी।

इसके बाद लगभग दो वर्षों से वे चौरई थाने में पदस्थ थे। यहां भी उन्होंने अपने शांत, सहज और हंसमुख व्यवहार से लोगों के बीच अपनी अलग पहचान कायम रखी। साथी पुलिसकर्मियों से लेकर आम नागरिकों तक, हर किसी के साथ उनका व्यवहार आत्मीयता से भरा रहता था।

उनके सहकर्मी उन्हें केवल एक साथी आरक्षक के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करते हैं, जिसकी मौजूदगी से माहौल में अपनापन घुल जाता था। आज वही साथी उनकी यादों को समेटे इस असहनीय सच्चाई को स्वीकार करने की कोशिश कर रहे हैं।

गुरुवार को उठा सीने में दर्द, फिर अस्पतालों के बीच जिंदगी बचाने की जद्दोजहद

प्राप्त जानकारी के अनुसार, गुरुवार सुबह आरक्षक सूर्या को अचानक सीने में दर्द हुआ। इसके बाद उन्हें चौरई के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां से चिकित्सकों ने उन्हें छिंदवाड़ा रेफर कर दिया।

उन्हें 100 डायल वाहन के माध्यम से छिंदवाड़ा स्थित विवांता हॉस्पिटल पहुंचाया गया। वहां उनका उपचार शुरू हुआ और ऑपरेशन भी किया गया। लेकिन उनकी हालत में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। स्थिति बिगड़ने पर शुक्रवार शाम चिकित्सकों की टीम की उपस्थिति में उन्हें आगे के उपचार के लिए नागपुर रेफर किया गया।

परिजनों और सहकर्मियों को उम्मीद थी कि बेहतर उपचार से सूर्या स्वस्थ होकर फिर लौटेंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। शनिवार सुबह करीब 8 बजे उनके निधन की खबर आई और उन तमाम उम्मीदों पर विराम लग गया, जिनके सहारे उनके अपने उनकी सलामती की प्रतीक्षा कर रहे थे।

एक दिन पहले तक जिस साथी के साथ ड्यूटी, बातचीत और हंसी-मजाक की बातें थीं, उसके अचानक चले जाने की खबर ने सभी को भीतर तक झकझोर दिया।

मेरी उम्र 36 वर्ष है…’ अस्पताल में कहे वे शब्द, जो अब कभी भुलाए नहीं जा सकेंगे

आरक्षक सूर्या के निधन से जुड़ा एक प्रसंग उनके साथियों के अनुसार अब उनकी स्मृतियों का बेहद भावुक हिस्सा बन गया है।

सहकर्मियों के मुताबिक, छिंदवाड़ा में अस्पताल में भर्ती कराने की प्रक्रिया के दौरान जब उनकी उम्र पूछी गई, तब उनके साथ मौजूद पत्नी मनीषा ने उनकी उम्र 35 वर्ष बताई। इस पर सूर्या ने तुरंत कहा— ‘मेरी उम्र 35 नहीं, 36 वर्ष है।’साथियों के अनुसार, यही उनके अंतिम शब्द थे, जिनके बाद उनका उपचार जारी रहा और इसी दौरान उनका निधन हो गया।

उम्र बताने के उस सामान्य-से क्षण में शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि ये शब्द एक दिन उनकी जिंदगी से जुड़ी आखिरी यादों में शामिल हो जाएंगे। उस समय यह अस्पताल की एक सामान्य प्रक्रिया थी, लेकिन आज वही बात उनके साथियों और अपनों के मन में गहरे उतर गई है।

जिस इंसान के साथ अभी जिंदगी की बातें हो रही थीं, जिसके आगे अभी बहुत-सा जीवन बाकी था, उसके बारे में अब केवल बीते पलों को याद किया जा रहा है।

‘मेरी उम्र 36 वर्ष है…’

अब ये शब्द केवल उम्र बताने वाले शब्द नहीं रह गए हैं। ये उस जीवन की एक मार्मिक स्मृति बन गए हैं, जो अपने पीछे परिवार, साथी और अनगिनत परिचितों की यादें छोड़ गया।

पत्नी, परिवार और साथियों के लिए कभी न भरने वाली कमी

आरक्षक सूर्या के असमय निधन से उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। पत्नी मनीषा और परिवार के लिए यह ऐसा आघात है, जिसकी पीड़ा को शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं। जिस जीवनसाथी के साथ आगे के जीवन की उम्मीदें जुड़ी थीं, उसका अचानक साथ छूट जाना किसी भी परिवार के लिए असहनीय पीड़ा है।

वहीं, पुलिस विभाग के उनके साथी भी अपने बीच से एक हंसमुख और आत्मीय व्यक्तित्व के चले जाने से स्तब्ध हैं। चौरई और चांद क्षेत्र में उन्हें जानने वाले लोग उनकी मुस्कान, सहज बातचीत और मिलनसार स्वभाव को याद कर रहे हैं।

उनकी पहचान केवल पुलिस की वर्दी तक सीमित नहीं थी। लोगों के बीच उनका व्यवहार और रिश्तों को निभाने का अंदाज भी उनकी पहचान का हिस्सा था। शायद यही कारण है कि उनके निधन की खबर सुनने के बाद भी अनेक लोगों के लिए इस सच्चाई को स्वीकार करना कठिन हो रहा है।

यादों में हमेशा जिंदा रहेगा सूर्या का मुस्कुराता चेहरा

जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि कभी-कभी कोई व्यक्ति बिना किसी पूर्व संकेत के अचानक ऐसा बिछड़ जाता है कि उसके जाने का खालीपन लंबे समय तक महसूस होता रहता है। आरक्षक सूर्योदय बघेल का जाना भी चौरई और चांद क्षेत्र के लिए ऐसा ही दुखद क्षण है।

16 वर्षों की पुलिस सेवा, चांद थाने में बिताए पांच वर्ष, चौरई में लगभग दो वर्षों का कार्यकाल और अनगिनत लोगों से बने आत्मीय संबंध—ये सब उनकी जीवन-यात्रा की ऐसी यादें हैं, जिन्हें उनके साथी और परिचित लंबे समय तक संजोकर रखेंगे।

आज उनकी कुर्सी, उनकी ड्यूटी और साथियों के बीच उनकी जगह शायद किसी व्यवस्था के तहत भर भी जाए, लेकिन किसी व्यक्ति की मुस्कान, उसका अपनापन और उससे जुड़ी यादें इतनी आसानी से नहीं भरी जा सकतीं।

विनम्र श्रद्धांजलि।