कहते हैं, “अगर इलाज समय पर मिल जाए, तो सबसे कमजोर शुरुआत भी मजबूत भविष्य में बदल सकती है।” जिले के विकासखण्ड हर्रई के सिविल अस्पताल के न्यूट्रिशन रिहैबिलिटेशन सेंटर (NRC) में ऐसी ही दो सच्ची कहानियाँ सामने आई हैं, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि कुपोषण हार नहीं है, बल्कि सही देखभाल से जीती जा सकने वाली चुनौती है।
नीतेश ठकरिया : जब देखभाल बनी संजीवनी –
“एक बच्चा स्वस्थ हो जाए, तो पूरा परिवार मुस्कुरा उठता है।”
आंगनबाड़ी केंद्र धनखुदरा के नीतेश ठकरिया कभी गंभीर कुपोषण की स्थिति में थे। दुर्गम क्षेत्र में रहने के कारण स्वास्थ्य सेवाएँ समय पर मिलना मुश्किल था। भर्ती के समय नीतेश का वजन 8.5 किलोग्राम था। एनआरसी में नियमित उपचार, लगातार मॉनिटरिंग और मां को दी गई पोषण संबंधी काउंसलिंग से उसके स्वास्थ्य में लगातार सुधार हुआ। आज नीतेश का वजन 11.7 किलोग्राम है और वह SAM से बाहर आकर सामान्य स्थिति में पहुँच चुका है। यह बदलाव आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और एनआरसी टीम की अथक मेहनत का परिणाम है, जिसने समय रहते एक मासूम भविष्य को संवार दिया।
प्रिंसी अंगारिया: समझाइश से सफलता तक –
“जब विश्वास बनता है, तब इलाज असर दिखाता है।”
आंगनबाड़ी केंद्र बीजाढाना की प्रिंसी अंगारिया स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर एक दुर्गम क्षेत्र की बच्ची है। शुरुआत में परिवार अस्पताल आने को तैयार नहीं था, लेकिन निरंतर समझाइश और फील्ड वर्क के बाद प्रिंसी को एनआरसी में भर्ती कराया गया। भर्ती के समय उसका वजन 5.4 किलोग्राम था। पोषण उपचार और सतत निगरानी के चलते आज उसका वजन 8.0 किलोग्राम हो गया है और वह भी SAM की श्रेणी से बाहर आकर सामान्य स्थिति में है। यह कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन और भरोसे से हर चुनौती को पार किया जा सकता है।
“कुपोषण लाइलाज नहीं, बस पहचान और इलाज की ज़रूरत है।” –
इन दोनों सफल उदाहरणों ने यह साफ कर दिया है कि समय पर पहचान, एनआरसी में उचित उपचार और निरंतर फॉलोअप से बच्चों को स्वस्थ जीवन दिया जा सकता है। आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और हर्रई अस्पताल की एनआरसी टीम ने मिलकर यह दिखा दिया कि जब सेवा भाव संकल्प बन जाए, तो असंभव भी संभव हो जाता ह








